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आधार, पैन, राशन कार्ड सब फेल, अब पासपोर्ट भी नहीं बचा नागरिकता का सबूत, तो आखिर क्या है असली प्रमाण?

विदेश मंत्रालय के बयान ने मचाई हलचल

देश में इन दिनों एक नई बहस छिड़ गई है और इसकी शुरुआत हुई है विदेश मंत्रालय के एक स्पष्टीकरण से। मंत्रालय की तरफ से साफ कहा गया है कि पासपोर्ट भी भारतीय नागरिकता का पुख्ता और अंतिम सबूत नहीं माना जा सकता। यह सुनकर बहुत से लोगों के होश उड़ गए, क्योंकि आम तौर पर पासपोर्ट को सबसे भरोसेमंद दस्तावेज समझा जाता रहा है। अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर पासपोर्ट भी काफी नहीं है, तो आखिर कौन सा कागज किसी को भारतीय नागरिक होने का दर्जा दिलाता है।

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बिहार की वोटर लिस्ट से शुरू हुआ था विवाद

यह पूरा मामला दरअसल बिहार में चल रही वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। इस प्रक्रिया के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल आया कि मौजूदा वोटरों से अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कौन से दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। कोर्ट ने इस बारे में कुछ टिप्पणियां भी की थीं, जिनमें यह संकेत मिला कि वोटर लिस्ट के लिए तय किए गए ज्यादातर दस्तावेज नागरिकता का अंतिम सबूत नहीं हैं। इसी बहस ने आगे चलकर पासपोर्ट को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए।

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आधार, राशन कार्ड और वोटर आईडी पहले से ही बाहर

कानूनी तौर पर देखा जाए तो आधार कार्ड कभी भी नागरिकता का सबूत नहीं रहा है। आधार से जुड़े कानून में ही यह साफ लिखा है कि यह सिर्फ पहचान और निवास का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। इसी तरह राशन कार्ड को सिर्फ सरकारी योजनाओं का फायदा लेने के लिए जारी किया जाता है, इसका नागरिकता से कोई सीधा संबंध नहीं है। वोटर आईडी भी सिर्फ यह बताता है कि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में दर्ज है, जबकि उस सूची में नाम जोड़ने से पहले अधिकारी अलग से नागरिकता की जांच करते हैं। पैन कार्ड का मामला तो और भी दिलचस्प है, क्योंकि कुछ विदेशी नागरिक भी वैध वीज़ा के आधार पर पैन कार्ड बनवा सकते हैं, इसलिए इसे भी नागरिकता का सबूत नहीं माना जा सकता।

अब पासपोर्ट पर भी उठे सवाल

जिस तरह से पासपोर्ट कानून बना है, उसके मुताबिक पासपोर्ट अथॉरिटी आवेदन की पूरी जांच करने के बाद ही पासपोर्ट जारी करती है, और अगर कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है तो उसे पासपोर्ट देने से इनकार करना जरूरी होता है। यानी पासपोर्ट इस आधार पर बनता है कि सरकार पहले से ही संतुष्ट हो जाती है कि आवेदक भारतीय नागरिक है। मगर अदालतों ने अपने कई फैसलों में यह साफ किया है कि अगर बाद में नागरिकता को चुनौती दी जाए, तो सिर्फ पासपोर्ट दिखाकर मामला खत्म नहीं हो जाता। मतलब पासपोर्ट नागरिकता का नतीजा तो हो सकता है, लेकिन वह खुद नागरिकता को साबित करने वाला अंतिम और इकलौता दस्तावेज नहीं बन सकता।

क्या कहते हैं अदालतों के पुराने फैसले

इस मसले पर अदालतों का रुख भी अलग अलग वक्त पर अलग रहा है। साल 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने पासपोर्ट को नागरिकता का सबूत मान लिया था। लेकिन 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट और इससे पहले 2005 में सुप्रीम कोर्ट यह कह चुके हैं कि सिर्फ पासपोर्ट या जन्म प्रमाण पत्र दिखा देना काफी नहीं है, बल्कि यह भी साबित करना जरूरी है कि माता पिता भी भारतीय नागरिक थे। सुप्रीम कोर्ट का यह भी कहना रहा है कि नागरिकता साबित करने की पूरी जिम्मेदारी उसी इंसान पर होती है जो खुद को नागरिक बता रहा है।

तो आखिर नागरिकता का असली सबूत क्या है

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि भारत में किसी एक भी दस्तावेज को नागरिकता का अंतिम और इकलौता सबूत नहीं माना गया है, जैसा कुछ दूसरे देशों में नेशनल सिटीजनशिप कार्ड के रूप में मिलता है। नागरिकता अधिनियम 1955 के मुताबिक अलग अलग समय में पैदा हुए लोगों के लिए अलग अलग शर्तें तय हैं। 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्मे लोगों को सीधे जन्म से नागरिक माना जाता है, और इसके लिए जन्म प्रमाण पत्र या स्कूल का रिकॉर्ड काफी होता है। लेकिन 1987 से 2003 के बीच जन्मे लोगों के लिए सिर्फ भारत में पैदा होना काफी नहीं है, बल्कि माता या पिता में से किसी एक का भारतीय नागरिक होना भी जरूरी है। वहीं 2003 के बाद जन्मे लोगों के लिए नियम और सख्त हैं, यहां माता पिता दोनों का भारतीय नागरिक होना जरूरी है, या फिर एक नागरिक होना चाहिए और दूसरा अवैध प्रवासी नहीं होना चाहिए।

कोर्ट किन दस्तावेजों पर करते हैं भरोसा

जब कभी अदालतों में नागरिकता को लेकर विवाद पहुंचता है, तो जज आम तौर पर सिर्फ एक दस्तावेज पर निर्भर नहीं रहते। इसके बजाय जन्म प्रमाण पत्र, माता पिता के पुराने दस्तावेज, स्कूल का सर्टिफिकेट जैसे दसवीं की मार्कशीट, और अगर किसी ने नागरिकता रजिस्ट्रेशन या नेचुरलाइजेशन के जरिए ली हो तो उससे जुड़े कागजात, इन सबको मिलाकर देखा जाता है। कई बार नागरिकता प्रमाण पत्र भी मांगा जाता है, जो कोर्ट, गृह मंत्रालय या राज्य सरकार की तरफ से जारी किया जाता है, लेकिन यह बहुत ही सीमित और खास परिस्थितियों में ही दिया जाता है।

आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है

इस पूरे विवाद से एक बात साफ हो जाती है कि नागरिकता साबित करना कोई एक कागज दिखाने जितना आसान काम नहीं है। आधार, पैन, वोटर आईडी, राशन कार्ड और अब पासपोर्ट के बाद भी, असल में किसी की नागरिकता तय करने के लिए जन्म से जुड़े दस्तावेज और माता पिता की नागरिकता का रिकॉर्ड ही सबसे भरोसेमंद माने जाते हैं। यही वजह है कि आने वाले समय में लोगों को अपने पुराने दस्तावेज खासकर जन्म प्रमाण पत्र और पुराने स्कूल रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की सलाह दी जा रही है, ताकि जरूरत पड़ने पर नागरिकता साबित करने में कोई परेशानी न हो।



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