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"Cockroach" बोला CJI ने और पैदा हो गई एक नई पार्टी CJP

 15 मई को सुप्रीम कोर्ट में ऐसा हुआ जिसने पूरे देश में आग लगा दी 

15 मई 2026। सर्वोच्च न्यायालय में एक मुकदमे की सुनवाई चल रही थी जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता पदनाम प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने इस याचिका को बेकार बताया और मुख्य न्यायाधीश बहुत नाराज़ हो गए। नाराज़गी में उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो पूरे देश में तूफान बन गया। मुख्य न्यायाधीश बोले "ऐसे नौजवान हैं जो तिलचट्टों की तरह हैं, उन्हें कोई रोज़गार नहीं मिलता, उनके लिए पेशे में कोई जगह नहीं है। कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया, कुछ सूचना के अधिकार के कार्यकर्ता और फिर सबपर हमला करते रहते हैं। यह समाज के परजीवी हैं जो व्यवस्था पर हमला करते हैं।" यह बात अदालत के बाहर आते ही आग की तरह फैल गई।

Source- socialmedia 

मुख्य न्यायाधीश ने अगले दिन दी सफाई  "मीडिया ने गलत समझा"

16 मई को जब पूरे देश में बवाल मच गया तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक सफाई जारी की। उन्होंने कहा  "मुझे दुख है कि मीडिया ने मेरी बात को गलत तरीके से पेश किया। मैंने जो कहा वो उन लोगों के बारे में था जो नकली और फर्जी डिग्री लेकर वकालत और दूसरे सम्मानित पेशों में घुस जाते हैं। ऐसे लोग परजीवी हैं जो पेशों की साख बर्बाद करते हैं। यह कहना बिल्कुल गलत है कि मैंने देश के युवाओं की आलोचना की। मुझे अपने युवाओं पर गर्व है, हर युवा मुझे प्रेरित करता है।" लेकिन देश के युवाओं ने यह सफाई नहीं मानी।

क्यों नहीं माना देश ने यह सफाई?

मुख्य न्यायाधीश की सफाई के बाद भी गुस्सा कम नहीं हुआ। इसकी वजह यह थी कि उनके अपने शब्दों में कहीं भी नकली डिग्री वालों का ज़िक्र नहीं था। उन्होंने साफ कहा था कि नौजवान तिलचट्टों की तरह हैं जिन्हें रोज़गार नहीं मिलता। यानी उन्होंने बेरोज़गारी को तिलचट्टा बनने की वजह बताया। भारत में स्नातक बेरोज़गारी की दर 29.1 फीसदी है। परीक्षा पत्र लीक ने लाखों छात्रों का भविष्य बर्बाद किया था। ऐसे माहौल में देश के सबसे बड़े न्यायाधीश का यह बयान युवाओं को सीधे चोट पहुंचाने वाला था।

"तिलचट्टा जनता पार्टी"एक मज़ाक जो आंदोलन बन गया

मुख्य न्यायाधीश के बयान के बाद सोशल मीडिया पर जो हुआ वो किसी ने नहीं सोचा था। युवाओं ने एक व्यंग्यात्मक आंदोलन शुरू किया जिसका नाम रखा "तिलचट्टा जनता पार्टी"। यह मज़ाक था लेकिन इसके पीछे का दर्द असली था। एक हफ्ते से भी कम वक्त में इस पार्टी के Instagram पर एक करोड़ से ज़्यादा अनुयायी हो गए। और यह आंकड़ा भाजपा के 87 लाख Instagram अनुयायियों से ज़्यादा था। यानी एक व्यंग्यात्मक आंदोलन ने देश की सत्तारूढ़ पार्टी को सोशल मीडिया पर पछाड़ दिया।

तृणमूल की महुआ मोइत्रा ने भी किया शामिल होने का दावा

"तिलचट्टा जनता पार्टी" इतनी बड़ी हो गई कि मुख्यधारा के नेता भी इसमें शामिल होने लगे। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा और कीर्ति आज़ाद ने सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया पर इस पार्टी में "आवेदन" किया। महुआ मोइत्रा ने X पर लिखा  "मैं भी तिलचट्टा हूं। तिलचट्टा जनता पार्टी में आवेदन कर रही हूं।" यह पोस्ट लाखों लोगों तक पहुंची। इसने एक बात साफ कर दी कि मुख्य न्यायाधीश का यह बयान सिर्फ एक अदालती टिप्पणी नहीं था बल्कि यह देश के युवाओं के दिल पर लगी एक गहरी चोट थी।

परीक्षा पत्र लीक से जुड़ा गुस्सा सब एक साथ फटा

"तिलचट्टा जनता पार्टी" का आंदोलन सिर्फ मुख्य न्यायाधीश के बयान के खिलाफ नहीं था। इसमें वो सारा गुस्सा था जो युवाओं में पिछले कुछ हफ्तों से इकट्ठा हो रहा था। NEET 2026 परीक्षा पत्र लीक ने 24 लाख छात्रों का भविष्य बर्बाद किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने एक शब्द नहीं बोला। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा नहीं दिया। राजस्थान में विरोध प्रदर्शन हुए, पानी की बौछारें चलीं लेकिन कुछ नहीं हुआ। और इसी निराशा के माहौल में मुख्य न्यायाधीश ने युवाओं को तिलचट्टा कह दिया। यह वो आखिरी तिनका था जिसने ऊंट की पीठ तोड़ दी।

"द वायर" का गंभीर सवाल  "इतिहास जानता है यह भाषा कहाँ ले जाती है"

"द वायर" ने इस पूरे मामले पर एक बहुत गंभीर लेख लिखा जिसका शीर्षक था "मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें तिलचट्टा कहा  इतिहास जानता है यह भाषा कहाँ ले जाती है।" इस लेख में याद दिलाया गया कि Rwanda में नरसंहार से पहले एक समुदाय को "तिलचट्टा" कहा गया था। Cambodia में, नाजी जर्मनी में, हर बार जब किसी समुदाय को कीड़े-मकोड़े कहा गया तो उसके बाद बहुत बुरा हुआ। "द वायर" ने कहा कि जब देश के सबसे बड़े न्यायाधीश की जबान से ऐसी भाषा निकले तो यह सिर्फ एक टिप्पणी नहीं  यह एक संवैधानिक संकट है।

यह खबर क्यों है इतनी अहम?

देश का सबसे बड़ा न्यायाधीश वो इंसान होता है जिस पर हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा की ज़िम्मेदारी होती है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने ही सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिया है। और जब उसी अदालत के मुखिया बेरोज़गार युवाओं को तिलचट्टा कहें तो यह सिर्फ एक बयान नहीं बल्कि एक सवाल है कि क्या हमारी न्यायपालिका सचमुच हर नागरिक की गरिमा की रक्षा करती है?


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