एक खुलासा जिसने पूरी इस्लामी दुनिया में हड़कंप मचा दिया
25 मई 2026 को ब्रिटेन के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान Middle East Eye ने एक ऐसा खुलासा किया जिसने पूरी दुनिया में भूचाल ला दिया। अमेरिका और इज़राइल मिलकर जेरूसलम की अल-अक्सा मस्जिद पर जॉर्डन की ऐतिहासिक संरक्षकता को खत्म करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। इसकी जगह एक नई व्यवस्था लागू करने की कोशिश हो रही है जो इज़राइल के हितों के अनुकूल हो। यह खबर पढ़ते ही जॉर्डन, फलस्तीन, तुर्की, पाकिस्तान समेत पूरी इस्लामी दुनिया में गुस्से की लहर दौड़ गई।
Jared Kushner और Mike Huckabee इस प्लान के दो बड़े चेहरे
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद Jared Kushner और इज़राइल में अमेरिकी राजदूत Mike Huckabee इस पूरे प्लान की अगुवाई कर रहे हैं। इस प्लान के तहत जॉर्डन समर्थित इस्लामी वक्फ की सत्ता खत्म करके उसकी जगह इज़राइली सरकार द्वारा बनाई गई एक नई संस्था को बिठाया जाएगा। Mike Huckabee एक कट्टर ईसाई धर्मगुरु हैं जो इज़राइल की अवैध बस्तियों के प्रबल समर्थक माने जाते हैं। इज़राइल ने यह विचार करीब एक दशक पहले ट्रंप प्रशासन के सामने रखा था और Huckabee के राजदूत बनने के बाद इसे आगे बढ़ाने की कोशिशें तेज़ हो गईं।
अल-अक्सा को "तीन धर्मों का केंद्र" बनाने की साजिश
दो अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि Washington ने इस परिसर के भविष्य के लिए एक दस्तावेज़ तैयार किया है जिसमें अल-अक्सा मस्जिद की मुस्लिम पहचान को खत्म करके इसे तीनों इब्राहीमी धर्मों यानी इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्म के लिए एक साझा केंद्र बनाने का प्रस्ताव है। इसके तहत यहूदियों को बड़े समूहों में नमाज़ पढ़ने की इजाज़त दी जाएगी। इतना ही नहीं इज़राइल को इमामों, धर्मगुरुओं और मस्जिद के वरिष्ठ कर्मचारियों की नियुक्ति में भी अहम भूमिका दी जाएगी। यहाँ तक कि जुमे के खुतबे पर भी इज़राइल की निगरानी रहेगी।
UAE, बहरीन, मिस्र, मोरक्को को बताया गया सऊदी अरब ने किया विरोध
यह प्लान सिर्फ अमेरिका और इज़राइल के बीच की बात नहीं रही। सूत्रों के मुताबिक इस प्रस्ताव को UAE, बहरीन, मिस्र और मोरक्को के साथ साझा किया जा चुका है। लेकिन सऊदी अरब ने इस प्लान का विरोध किया है। एक सूत्र ने कहा कि सऊदी अरब जानता है कि जेरूसलम और अल-अक्सा की मौजूदा व्यवस्था को कमज़ोर करने के क्या नतीजे होंगे इसलिए वो इस प्लान के खिलाफ है।
जॉर्डन की संरक्षकता 1994 से चली आ रही है यह व्यवस्था
जॉर्डन 1994 की इज़राइल-जॉर्डन शांति संधि के तहत अल-अक्सा मस्जिद और जेरूसलम के ईसाई पवित्र स्थलों का संरक्षक है। जॉर्डन का इस्लामी वक्फ विभाग दशकों से मस्जिद का प्रबंधन करता आया है। जॉर्डन इस संरक्षकता को अपनी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पहचान का एक अहम हिस्सा मानता है। एक सूत्र ने कहा कि यह संरक्षकता क्षेत्रीय स्थिरता का एक मज़बूत स्तंभ है और इसे हटाने की कोशिश बेहद खतरनाक होगी।
ईसाई पवित्र स्थलों का भविष्य भी अधर में
इस पूरे प्लान में एक और चिंताजनक पहलू है। Middle East Eye से बात करने वाले सभी सूत्रों ने कहा कि इस नए प्रस्ताव में जेरूसलम के ईसाई पवित्र स्थलों के भविष्य के बारे में कुछ नहीं बताया गया। जॉर्डन Holy Sepulchre Church और Church of the Ascension का भी संरक्षक है। एक सूत्र ने कहा "यह प्लान ईसाई स्थलों के बारे में कुछ नहीं बताता जिससे एक बिल्कुल नई तरह की चिंता पैदा हो गई है।"
अमेरिका ने खबर को बताया "बिल्कुल गलत"
खबर के प्रकाशित होने के बाद एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि White House जॉर्डन की संरक्षकता हटाने पर काम नहीं कर रहा और यह रिपोर्ट "बिल्कुल गलत" है। लेकिन Middle East Eye ने कहा कि उनकी खबर अमेरिकी, जॉर्डनी, फलस्तीनी, पश्चिमी और खाड़ी देशों के कई सूत्रों पर आधारित है। इतने सारे सूत्रों की बात को एक साथ नकारना आसान नहीं है।
इस्लामी दुनिया में क्यों इतना गुस्सा?
अल-अक्सा मस्जिद इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र स्थान है। मक्का और मदीना के बाद दुनिया के हर मुसलमान के लिए यह जगह बेहद मुकद्दस है। इसकी पहचान बदलने की कोई भी कोशिश पूरी इस्लामी दुनिया को सीधे चोट पहुंचाती है। मार्च 2026 में ही जब इज़राइल ने रमज़ान के दौरान अल-अक्सा के दरवाज़े बंद किए तो कतर, जॉर्डन, इंडोनेशिया, तुर्की, पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिस्र और UAE ने मिलकर इसकी कड़ी निंदा की थी। और अब जब अमेरिका-इज़राइल के इस गुप्त प्लान का खुलासा हुआ है तो गुस्सा और भी बढ़ गया है।
आगे क्या होगा?
यह मामला अभी और उलझेगा। जॉर्डन ने साफ कर दिया है कि उसकी संरक्षकता की स्थिति 1994 की शांति संधि पर आधारित है और वो इसे छोड़ने वाला नहीं है। फलस्तीनी नेतृत्व ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। तुर्की और पाकिस्तान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। सवाल यह है कि क्या अमेरिका और इज़राइल इतने बड़े विरोध के बावजूद इस प्लान को आगे बढ़ाएंगे? और अगर बढ़ाया तो इसके नतीजे पूरे मध्य पूर्व और इस्लामी दुनिया के लिए क्या होंगे?
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