आज का दिन बड़ा मुबारक है!
तमाम दोस्तों, भाइयों और बहनों को ईद-उल-अज़हा यानी बकरीद की दिल की गहराइयों से मुबारकबाद! आज का यह पाक और मुबारक दिन हम सबके लिए खुशियाँ, सुकून और बरकत लेकर आए। अल्लाह तआला आप सबकी इबादत और कुर्बानी को कबूल फरमाए, आपके घरों में रहमत और बरकत नाज़िल करे और पूरी दुनिया में अमन और भाईचारा कायम रखे। ईद मुबारक हो आप सभी को!
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बकरीद की कहानी हज़रत इब्राहिम की अज़ीम कुर्बानी
बकरीद की बुनियाद हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की उस अज़ीम आज़माइश पर है जो आज भी हर मोमिन के दिल को झकझोर देती है। अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहिम को हुक्म दिया कि अपनी सबसे अज़ीज़ चीज़ यानी अपने प्यारे बेटे हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम को अल्लाह की राह में कुर्बान करो। हज़रत इब्राहिम ने बिना एक लम्हे की हिचकिचाहट के अल्लाह के हुक्म पर सर झुका दिया। जब उन्होंने अपने बेटे को कुर्बान करने का इरादा किया तो अल्लाह ने उनकी इस बेमिसाल आस्था और फरमाँबरदारी को देखकर बेटे की जगह एक जानवर की कुर्बानी कबूल फरमाई। तब से लेकर आज तक यह पाक सुन्नत हर साल ईद-उल-अज़हा पर अदा की जाती है।
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कुर्बानी का असली मफहूम
कुर्बानी का मतलब सिर्फ जानवर ज़िबह करना नहीं है बल्कि इसकी रूह यह है कि अल्लाह की राह में अपनी सबसे अज़ीज़ चीज़ को भी कुर्बान करने की हिम्मत रखो। कुर्बानी का गोश्त तीन हिस्सों में तकसीम किया जाता है। एक हिस्सा अपने अहल-ओ-अयाल के लिए, एक हिस्सा अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए और एक हिस्सा उन ग़रीब और ज़रूरतमंद लोगों के लिए जो खुद कुर्बानी नहीं कर सकते। यही बकरीद का सबसे बड़ा पैगाम है कि जो नेमत अल्लाह ने तुम्हें दी है उसे अपने भाइयों के साथ मिलकर बांटो।


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